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ढाई मीटर का था वो
कम से कम
जिंदा कहे जाने की हलचल
खो चुका था
घिरा था लाखों के बीच
अस्तित्व मिटा रहे थे
वे उसका
क्या दोष था उसका
यही कि?
चला जा रहा था चुपचाप!
पर जीने का यह कायदा नहीं है
आ गयें थे
भालें, बरछें, पत्थर और बन्दूक
लोगों की हाथों में
बरस पड़ा था उसपर
सबकुछ
उसके बाद कीड़ों का साम्राज्य
सेंध लगा गया था
कहते हैं कि
पाप की सज़ा
कीड़े पड़ना जैसा है
एक दिन और गुजरा
-कंकाल छोड़ गया था
नर्क का जीता-जागता सबूत!

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Written By Shailesh Bharatwasi!
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